TL;DR (संक्षेप में)
इंडियन पॉथोल्स (Indian Potholes) जैसे नागरिकों द्वारा बनाए गए प्लेटफॉर्म्स यह दिखाते हैं कि आम लोग भी मिलकर अपनी रोज़मर्रा की बुनियादी समस्याओं का प्रैक्टिकल हल ढूंढ सकते हैं। लेकिन, जब ये समाधान सिस्टम की कमियों को लगातार और साफ़ तौर पर जनता के सामने लाने लगते हैं, तो उस प्रशासन में खलबली मच जाती है जिसे जानकारी को छुपाकर या दबाकर रखने की आदत है। दूसरी तरफ़, ज़्यादातर लोग सिर्फ़ मूकदर्शक बने रहते हैं, जिससे ऐसी कोशिशें कमज़ोर पड़ जाती हैं। असल समस्या हमारे ढांचे की है, जहाँ आम जनता, अफ़सरशाही (ब्यूरोक्रेसी) और हमारे नेता—तीनों एक-दूसरे से पूरी तरह कटे हुए हैं।
हम सब भारत की सड़कों पर चलने वाले इस रोज़ के नाटक से अच्छी तरह वाकिफ़ हैं।
सुबह काम पर जाते समय आपको रास्ते में वही पुराना, जानलेवा गड्ढा मिलता है। आपकी गाड़ी को अब तक आदत हो चुकी है कि किस सेकंड पर किधर स्टीयरिंग मोड़ना है। आप अपनी रफ़्तार धीमी करते हैं, थोड़ी देर के लिए अपनी सांस रोकते हैं, सिस्टम को मन ही मन कोसते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। धीरे-धीरे, आपका दिमाग इस हालत को स्वीकार कर लेता है। आप नगर निगम (Municipal Corporation) से उम्मीद करना ही छोड़ देते हैं। बस, किसी तरह सुरक्षित घर पहुंच जाना ही आपका एकमात्र लक्ष्य बन जाता है।
लेकिन कभी-कभी, किसी एक इंसान के सब्र का बांध टूट जाता है और वह इस व्यवस्था के खिलाफ़ कुछ करने की ठान लेता है।
Indian Potholes जैसी वेबसाइट्स और ऐप्स इसी गुस्से और बदलाव की सोच से जनम लेते हैं। इन्हें किसी बड़ी, अमीर टेक कंपनी या सरकारी विभाग ने नहीं बनाया। इन्हें हमारी और आपकी तरह आम नागरिकों ने अपनी जेब से पैसा और वक़्त लगाकर खड़ा किया है, ताकि उन समस्याओं का समाधान निकाला जा सके जिन्हें बाक़ी सब ने देखना ही छोड़ दिया है। सड़कों की बदहाली को तस्वीरों, लोकेशन और तारीख़ के साथ एक लाइव ऑनलाइन नक्शे (Map) पर सहेज कर रखना कोई मामूली काम नहीं है—इसके लिए बेहिसाब मेहनत और पक्के इरादे की ज़रूरत होती है।
ऐसी सोच आज के दौर में बहुत कम देखने को मिलती है, और इसका सम्मान होना चाहिए।
लेकिन अफ़सोस, भारत की कई बेहतरीन नागरिक कोशिशों की तरह, ‘इंडियन पॉथोल्स’ का प्लेटफॉर्म भी अब बंद हो चुका है। उसकी वेबसाइट डाउन है और प्रोजेक्ट ठप पड़ गया है। लोग कहेंगे कि यह “पैसों की कमी” या “बनाने वाले की थकान” की वजह से हुआ। लेकिन असलियत इससे कहीं ज़्यादा कड़वी है: हमारा सरकारी तंत्र जानबूझकर ऐसी अड़चनें खड़ी करता है ताकि उसे अपनी कमियाँ न छुपानी पड़ें, और रही-सही कसर हम आम लोगों की उदासीनता (apathy) पूरी कर देती है, जो इन सच्चे लोगों का साथ देने कभी आगे नहीं आते।
जब सच का सामने आना ‘सिस्टम’ के लिए ख़तरा बन जाता है
ऊपर से देखने पर, गड्ढों को ट्रैक करने वाला यह ऐप सिर्फ़ सड़क सुरक्षा का एक साधन लगता है। लेकिन स्थानीय प्रशासन की नज़रों में यह डेटा एक हथियार की तरह है जो सीधे उन पर वार करता है।
अगर शहर में कोई एक सड़क टूटी हो, तो नगर निगम (जैसे BMC, BBMP, या PMC) के पास बहानों की कोई कमी नहीं होती। वे आसानी से कह देते हैं, “यह तो बस कुछ दिनों की दिक़्क़त है,” या “वहाँ तो पैच-वर्क का काम पहले से ही चल रहा है।”
लेकिन जब एक खुली वेबसाइट पर शहर के सैकड़ों गड्ढे लाइव मैप पर दिखने लगें, और यह साबित हो जाए कि ये सड़कें महीनों से ऐसी ही बदहाल हैं, तो सारे बहाने धरे के धरे रह जाते हैं। तब जनता का सवाल यह नहीं होता कि “सड़क पर गड्ढा है,” बल्कि यह हो जाता है कि “अफ़सर आख़िर अपनी सैलरी किस बात की ले रहे हैं और काम क्यों नहीं कर रहे हैं?”
हमारे सरकारी महकमों को हर जानकारी को अपनी मुट्ठी में रखने की आदत है। वे तय करना चाहते हैं कि जनता को क्या दिखना चाहिए और क्या नहीं। जब कोई आम आदमी पारदर्शी तरीके से सारा सच इंटरनेट पर रख देता है, तो सिस्टम के हाथ से बहाने बनाने और काम को टालने की ताकत छिन जाती है। जब आप उन्हें सच के कटघरे में खड़ा करते हैं, तो वे असहज हो जाते हैं।
‘VIP’ मानसिकता: अफ़सर बनाम आम आदमी
सरकार इन नागरिक ऐप्स को कभी सीधे और खुले तौर पर बंद नहीं करती। इसके बजाय, वे एक धीमा और मानसिक रूप से थका देने वाला रास्ता चुनते हैं: लाल फीताशाही (Red Tape) और कागज़ी कार्रवाई।
अफ़सर ऐसे बेतुके और परेशान करने वाले सवाल पूछना शुरू कर देंगे: “आपको यह डेटा इकट्ठा करने की इज़ाज़त किसने दी? क्या यह कानूनी है? क्या आप सरकारी नियमों का पालन कर रहे हैं?” वे उन लोगों को चुप कराने के लिए नियमों को ही हथियार बना लेते हैं जो असल में शहर की भलाई के लिए काम कर रहे हैं।
इन तमाम कागज़ी बहानों के पीछे एक बहुत ही बदसूरत हकीकत छुपी है: आज भी हमारे देश में कई सरकारी अफ़सर खुद को जनता का सेवक (Public Servant) नहीं, बल्कि इस सिस्टम का मालिक समझते हैं।
एक जड़ हो चुके सरकारी विभाग के लिए, अपनी मर्ज़ी से शहर सुधारने निकला कोई जागरूक नागरिक कोई मददगार नहीं, बल्कि एक ‘सिरदर्द’ होता है। इस तंत्र के भीतर एक ऐसी घमंडी सोच बैठी है जो टैक्स देने वाले आम नागरिकों को कीड़े-मकोड़ों की तरह समझती है। हमें एक मामूली रुकावट माना जाता है जिसे जब चाहो अनदेखा कर दो या चुपचाप किनारे लगा दो। एक सरकारी अफ़सर को किसी आम आदमी के सामने जवाबदेह होना पड़े, यह बात उनके सत्ता के इस भ्रम को तोड़ देती है।
हमारी अपनी ख़ामोशी भी है ज़िम्मेदार
लेकिन, इस बर्बादी के लिए हम सारा दोष सिर्फ़ सरकार के सिर नहीं मढ़ सकते। हम आम नागरिक भी उतने ही गुनहगार हैं।
हम में से ज़्यादातर लोग इन प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल बहुत ही स्वार्थी और पैसिव (passive) तरीके से करते हैं। हम वेबसाइट खोलते हैं, देखते हैं कि हमारे घर के पास वाला गड्ढा लिस्ट में है या नहीं, शायद एक शिकायत दर्ज करते हैं, और फिर भूल जाते हैं। हम इन नागरिक मंचों को एक ‘फ्री कस्टमर सर्विस ऐप’ की तरह देखते हैं, न कि एक ऐसी नाज़ुक और ज़रूरी कोशिश के रूप में जिसे हमारी सुरक्षा और सहयोग की ज़रूरत है।
जब इस प्लेटफॉर्म को बनाने वाले को भ्रष्ट अफ़सरों की तरफ़ से धमकियां मिलती हैं, कानूनी नोटिस थमाए जाते हैं, या उन पर दबाव बनाया जाता है, तो हम यूज़र्स उनके पीछे ढाल बनकर खड़े नहीं होते। सड़कों पर कोई जन-आक्रोश नहीं दिखता। जो इंसान अकेले पूरी व्यवस्था को बदलने निकला था, उसे इस विशाल सरकारी मशीनरी के सामने बिल्कुल अकेला छोड़ दिया जाता है।
चूंकि हम इन प्रोजेक्ट्स को “अपनी” समस्या नहीं मानते, इसलिए ये कभी सुरक्षित नहीं रह पाते। जब सिस्टम आगे बढ़कर उस आवाज़ को दबाता है, तो बाक़ी की भीड़ बस तमाशा देखती है या मुँह फेर लेती है।
सिस्टम की गहरी खाई
इन नागरिक कोशिशों का दम तोड़ देना यह साफ़ दिखाता है कि हमारा भारत किस कदर अंदर से बंटा हुआ है:
[ आम जनता ] ------------------> जो हर दिन इस प्रशासनिक नाकामी को, हादसों और ट्रैफ़िक को भुगतती है। | v (आपसी संपर्क का न होना) [ अफ़सरशाही / ब्यूरोक्रेट्स ] --------> जो AC दफ्तरों में बैठकर जनता के पैसे और ठेकेदारों को कंट्रोल करते हैं। | v (आपसी संपर्क का न होना) [ नेता / कॉर्पोरेटर / MLA ] --------> जो कागज़ पर जनता के प्रति जवाबदेह हैं, पर दिखते सिर्फ़ चुनाव के वक़्त हैं।ये तीनों हिस्से आपस में कभी भी सीधे, साफ़ और ईमानदारी से बात नहीं करते। नागरिक वेबसाइट्स बाहर से इस खाई को पाटने की कोशिश करती हैं। लेकिन क्योंकि ये पूरी तरह से इस सरकारी ढांचे से बाहर होती हैं, इसलिए सरकार इन्हें एक रचनात्मक सुझाव या फीडबैक के रूप में नहीं देखती, बल्कि अपनी “बदनामी” या “हमले” के रूप में देखती है। इनमें स्पष्टता तो होती है, पर इन्हें सरकारी काम का हिस्सा नहीं बनने दिया जाता।
समाधान: सच को सरकारी कामकाज का हिस्सा बनाना होगा
‘इंडियन पॉथोल्स’ के बंद होने की असली त्रासदी यह नहीं है कि वह प्लेटफॉर्म नाकाम रहा। त्रासदी यह है कि इस सड़े हुए सिस्टम ने उसे कभी कामयाब होने ही नहीं दिया।
हमें अब यह पूछना बंद करना होगा कि नागरिकों की ये कोशिशें आख़िर बाहर रहकर सर्वाइव क्यों नहीं कर पातीं। इसके बजाय, हमें सरकार से यह पूछना शुरू करना होगा कि वे इस तरह के डेटा का इस्तेमाल करने से कतराते क्यों हैं?
ज़रा सोचिए, क्या ही बेहतर होता अगर इन ऐप्स पर दर्ज की गई शिकायतें सीधे नगर निगम के आधिकारिक वर्कफ़्लो (कामकाज की सूची) में एक अनिवार्य टास्क के रूप में जुड़ जातीं। तब जवाबदेही के लिए किसी अकेले नागरिक को अपनी जान या सुकून दांव पर लगाकर आवाज़ उठाने की ज़रूरत नहीं पड़ती; यह सरकारी नौकरी की प्रक्रिया का एक सामान्य हिस्सा होता।
जब तक हमारे ढांचे में यह बदलाव नहीं आएगा, भारत में हर अच्छे सिविक-टेक (civic tech) प्रोजेक्ट का अंत इसी तरह दुखद होगा: वे पूरे जोश के साथ शुरू होंगे, बेहतरीन नतीजे दिखाएंगे, और फिर धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में खो जाएंगे। इसलिए नहीं कि हमारी सड़कें रातों-रात मखमली हो गईं, बल्कि इसलिए क्योंकि यह सिस्टम सड़कों के गड्ढों के साथ जीना मंज़ूर कर सकता है, पर आम जनता के सामने झुकना और जवाब देना कभी नहीं।
आपके क्या विचार हैं?
क्या आपने भी अपने शहर में ऐसे अच्छे ऐप्स या पोर्टल्स को गायब होते देखा है? हम सिर्फ़ मूकदर्शक बने रहने के बजाय इन टूल्स के रखवाले और मददगार कैसे बन सकते हैं? नीचे कमेंट्स में अपनी राय ज़रूर साझा करें।
अगर आपको यह लेख सही और ज़रूरी लगा, तो इसे उनके साथ ज़रूर शेयर करें जो हर दिन अपनी जान हथेली पर रखकर इन गड्ढों से जूझ रहे हैं।


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